तीन तलाक के मुद्दे का 3-2 के बहुमत से निर्णय होना, क्या लगता है कि मुद्दे का सही और तार्किक समाधान हो गया है?
क्या इतना संवेदनशील मुद्दा बहुमत के आधार पर निर्धारित होना चाहिए या न्यायाधीशों की सर्व सहमति को वरीयता मिले ?
जब संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है तो न्यायिक प्रक्रिया में ऐसे मुद्दे साधारण बहुमत के आधार पर सुलझाने की संपूर्ण व्यवस्था प्रश्नगत है।
मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि इस निर्णय ने संपूर्ण मामले को और अधिक उलझा दिया है।तमाम तर्कों और बहसों के बाद यदि 5 न्यायाधीश एक समान निर्णय पर नहीं पहुँच सके तो समाज को किन तर्कों का सहारा लेकर समझाया जाएगा ???
क्या साधारण व्यक्ति की नजर में यह थोपा हुआ निर्णय प्रतीत नहीं होता !!!!
निर्णय में विविधता और विषमता शायद यह इंगित करती है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होना आसान नहीं है......
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