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हिंदी निबंध | गोष्ठी

edited January 2015 in Essay
हिंदी माध्यम वाले यदि चाहे तो निबंध लिखकर उसे शेयर कर सकते हैं | उसकी हर तरह से आलोचना की जाए विचारों की तारतम्यता, , विषय पर पकड़, भाषा शैली, गहराई, लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई हर लिहाज से | यदि ब्लॉग पे लिखा हो तो उसका लिंक या pdf img किसी भी रूप में शेयर कर सकते हैं |
उदेश्य है सिर्फ और सिर्फ निबंध निबंध और निबंध की तैय्यारी
मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
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Comments

  • https://contactmanishchoudhary.wordpress.com/2014/12/26/managing-work-and-home-is-the-indian-woman-getting-fair-deal/

    मैंने एक निबंध लिखा है आलोचक आमंत्रित है
    आओ एक दूसरे की आलोचना करें
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • @jatsab from where can we study quotes in Hindi. I will be writing my exam in English but for mppsc mains Hindi is a compulsory paper. If u can help TIA
    What though the field be lost
    All is not lost
    The unconquerable will and the courage
    Never to submit or yield- Zahiruddin Babar
  • @arav_kumar2013 bhai yaha b
    hehe
    nyways kya kaisi h prep??
    kya kya cover kar Lia?
  • @arav_kumar2013 मेरे हिंदी ऑप्शनल नहीं है पर थोड़ी बहुत हिंदी साहित्य पढ़ी है अन्यथा मेरे पास कोई दूसरा source नहीं है फिर भी कुछ quote हैं मेरे पास आप e-mail id दें आपको प्रेषित करता हूँ
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • Bhai send it to shubhamsharm5@gmail.com
    me too writing mains state psc.
  • https://contactmanishchoudhary.wordpress.com/2015/01/16/hindi-to-be-our-national-languageक्या-हिंदी-को-राष्ट्र/

    क्या हिंदी को राष्ट्रभाषा होने को मांगता ... निबंध लिखा है, भद्रजनों से टिप्पणी का आकांक्षी ;))
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • अधिकार(सत्ता) बढ़ने के साथ साथ उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है
    http://jatsab.blogspot.in/2015/02/blog-post.html
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • अधिकार(सत्ता) बढ़ने के साथ साथ उत्तरदायित्व भी बढ़ जाता है
    http://jatsab.blogspot.in/2015/02/blog-post.html
    Bro.. its good..
    have you written as per word limit ?? ye wala essay approx kitne words ka hai lagbhag ?? count kiya aapne??
  • @Jude_law bhai 1266 words hai. 1200 ki limit ko cross karta hai
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • @Jude_law bhai 1266 words hai. 1200 ki limit ko cross karta hai
    cool...itna chalta hai bhai..
    is baar yahi aise likha aapne??
  • nahi bhai is baar mein pre mein hi atak gaya ho to ...khunnas nikalta hoo essay likh likh ke
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • ohh...koi nahi bhai...don't lose focus.. keep going...
    Essay is good..you have incorporated examples too... so essay mai achhe marks pakke ..
    Bus examples like anti trust law , how big companies have exploited smaller ones... so you can say that capitalistic power was in irresponsible hands...else the fruit of capitalism would have been equally distributed among poor as well .. giving a balance viewpoint...at the same time mention some company which has done a lot of good work too... so that makes comparison complete...

    This is what I think bro.. keep going!!!
  • ohh...koi nahi bhai...don't lose focus.. keep going...
    Essay is good..you have incorporated examples too... so essay mai achhe marks pakke ..
    Bus examples like anti trust law , how big companies have exploited smaller ones... so you can say that capitalistic power was in irresponsible hands...else the fruit of capitalism would have been equally distributed among poor as well .. giving a balance viewpoint...at the same time mention some company which has done a lot of good work too... so that makes comparison complete...

    This is what I think bro.. keep going!!!
    shukriya for feedback. you are right, i missed there. :\">
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • :)
    मौन भी अभिव्यंजना है,
    जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो :
    तुम व्याप नहीं सकते,
    तुममे जो व्यापा है उसी को निबाहो /
  • क्या राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीयवाद विरोधी हैं जिनका सहअस्तित्व संभव नहीं है (Nationalism and Internationalism are opposing and mutually exclusive)
    http://jatsab.blogspot.in/2015/03/nationalism-and-internationalism-are.html

    कुछ ज्यादा सूझा नहीं आप लोग कुछ सुझाव दें सके तो ...
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • please tell me source of Hindi essay for capf exam. __book name or website link!!!
  • @beyondthelimit mukherjee nagar mein sab mil jaata hai, koi bandhu ho to aapko bata dega notes book etc. par mujhe nahi lagta wo sab kisi kaam ke hain
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • @jatsab

    Bahut badiya sirjee.... Kuch essays aur daal do
  • jatsab-then what should i do????
  • @chuds ji zaroor daalooga, waise aap bhi daal sakte ho agar kuch likhte ho to
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • @beyondthelimit ji आप स्वयं लिखकर देखिये , में कोई एक्सपर्ट तो नहीं पर मुझे लगता है खुद लिखकर अभ्यास करने का कोई विकल्प नहीं है | बाकि निबंध के नोट्स वोट्स कुछ ख़ास काम के नहीं लगते
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • "तीन तीन के छोड़ चले जाने के बाद तो लगा कि भगवान ने अब इस रासलीला का एंड करने की सोच ही ली है .... मैं भी दिल पे पत्थर रखके दूसरे कामों में बिजी रहने लगा कि शायद अब तो वो ही आएगी जिसको घरवाले लायेंगे ..... फिर भी यह भटकता मन कहाँ मानता है ... जैसे ही घर से बाहर कदम रखा नहीं कि सब्जी मंडी से लेकर पताशे वालों के ठेले तक नजरें एक खोजी अभियान में जुट जातीं मानो किसी की अदद तलाश हो ....... एक अरसे से फ़ोन से लेकर मेसेज बॉक्स तक खाली पड़ा था ...... उसे भरने वाले साथी की नितांत आवश्यकता भी महसूस होती थी..... इसलिए तलाशी अभियान अपने जोरों पर रहा ..... शायद ही कोई ब्याह, सम्मलेन, भोजन प्रसादी कार्यक्रम ऐसा रहा होगा उस समय, जो मिस किया गया हो ...... तो ऐसे ही एक दोपहरी आदेश आया कि फलां महिला संगीत कार्यक्रम में छोड़ के आ ... सो मजबूरन आरामदायक बिस्तर छोड़कर कपड़े पहनने के लिए उठना पड़ा ..... सहसा ख्याल आया कि जब जाना ही है तो क्यूँ न जाकर लुत्फ़ ही उठाया जाये ...... सो एक नयी सी जीन्स और टीशर्ट बदन पे टांक कर मोटर साइकिल उठाई तो टोक पड़ ही गयी ........ अब समझते तो घरवाले भी हैं पर फिर भी जानत गैलाई करते ही हैं .....

    खैर वहां पहुँचने के बाद काफी परिचित मिले तो रोक ही लिया गया ...... आँखें भी भटककर बार बार स्टेज पे ही जा रही थी .... कि अचानक आँखें बौरा सी गयी ...... स्टेज पे चढ़ रही नवयौवना पहली वाली सरीखी दिखी ...... सर को झटका देकर दुबारा देखा .... तब तक डिमांड वाला गाना चल चुका था ...... 'क्यूँ पैसा पैसा करती है, क्यूँ पैसे पे तू मरती है' ...... डांस स्टेप्स ,मूव्ज़ और स्ट्रेटिंग कराये हुए बालों की छटा देखकर कहीं से भी नहीं लग रहा था कि इसका कभी ब्रेक अप भी हुआ होगा ....... वो तो कतई ऐसा फील करा रही थी कि मानो यह पति ही पहला और आखिरी प्यार है... और स्टेज के नीचे मोबाइल से विडियो बनाते पति की ख़ुशी भी उस फीलिंग को जस्टिफाई कर रही थी ...... यह सोचकर मन पे पत्थर रखा कि अपन कौनसा इसके लिए रोज शोक मानते हैं और अपना ध्यान साथ में नाच रही उस लड़की पर केन्द्रित किया जिसकी शादी का आयोजन था .......

    तभी पीछे से एक ग्रुप के सीटबाज सरीखों की आवाज सुनाई पड़ती है ... 'कमाल है यार, कहीं से नहीं लग रहा कि इसने (जिसकी शादी होनी है) दसियों का *तिया काटा है ........ इसे तो कोई टेंशन ही नहीं लग रही ......... टेंशन!! अबे ये तो पंद्रह दिन से डांस कि जबर प्रेक्टिस कर रही है .... ग्रुप बुलवाया है पूरा सीखने के लिए .........'
    सुनते ही मेरी हंसी फूट पड़ी ...... उनमे से एक बोला, 'क्यूँ भाई क्या हो गया' ..... मैं बोला कुछ नहीं, ये बताओ, 'तुम में से किसका दिल तोड़ा है इसने ?' ........ एक की तरफ इशारा हुआ...... दूसरा मेरी और होकर बोला, 'क्यूँ भाई तेरो भी याई (इसी) ने *तियो काटो के (क्या) ??'.... मैं हंसकर बोला, 'नहीं.. बगल वाली ने' ........ अचानक सबकी हंसी निकल पड़ी... सब एक ही बीमारी के मरीज थे जिसके डॉक्टर को पता होने पर भी अनजान बना हुआ था .......
    मैंने पूछा, 'अब जब बुरा लग ही रहा है फिर यहाँ कर रहे हो ?' ... बोले कुछ नहीं बस 'चक्षुचो*न' "
    ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्
  • http://jatsab.blogspot.in/2015/04/blog-post.html
    शब्द दोधारी तलवार से अधिक तीक्ष्ण होते हैं :^o
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • Hindi PASSAGES practice ke liye kya strategy thik rahegi...pichhle saal English comprehension ne bohot loss kiya...shayayd achchi tarhase samaz nahi paya..

    Thanks..
  • http://jatsab.blogspot.in/2015/05/you-can-lead-horse-to-water-but-you.html
    You can lead a horse to water, but you can’t make him drink
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • http://jatsab.blogspot.in/2015/05/normal-0-false-false-false-en-us-x-none.html
    Political Interference in Bureaucracy – Causes, Consequences and Remedies
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • “I object to violence because, when it appears to do good, the good is only temporary; the evil it does is permanent.”
    http://jatsab.blogspot.in/2015/09/i-object-to-violence-because-when-it.html
    साथियों हिंदी माध्यम के essay पढने में नहीं आते ज्यादा, कोई पोस्टल टेस्ट सीरीज भी ढंग की नहीं है | आप में से कोई essay लिखता हो तो कृपया साझा करें ...तुलना करने में आसानी होगी
    ;))
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
  • @popeyee_jahaji bhai i have written an essay on topic provided by you. plz give your comments. in future i will try to write on all topics provided by you on this thread.


    I object to the violence because when it appears to do good, the good is only temporary; the evil it does is permanent.
    मुझे हिंसा पर आपत्ति है, जब यह अच्छा करती हुई प्रतीत होती है तो वह अच्छाई अस्थाई होती है, जबकि इसके द्वारा की गयी बुराई स्थायी।

    गुरु कुम्हार सिष कुम्भ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट,
    अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट।
    एक कुम्हार घड़े पर बाहर से तो थपकियाँ देता है पर अंदर से हाथ का सहारा देकर उसे सही आकार देता है वैसे ही गुरु शिष्य को ढ़ालता है। - कबीर
    कबीर के इस दोहे का भाव सकारात्मक है कि गुरु बाहरी तौर पर भले ही अनुशासन और कड़ाई करे पर उसकी आंतरिक भावना सदैव शिष्य का हित करने की होती है। लेकिन स्कूली बच्चों के साथ पढ़ाई को लेकर मारपीट भारतीय समाज का एक क्रूर सत्य है। निस्संदेह यह बालक के कोमल मन और शरीर के साथ हिंसा है लेकिन कितने लोग इसका विरोध करते हैं ? ..... वास्तव में बहुत कम। अधिकांश लोगों की मानसिकता यही होती है कि- बालक और बूट रगड़ने से ही चमकता है। ऐसे लोग अपने बालकों को बखूबी रगड़ते हैं। अध्यापक रगड़े तो कृतज्ञतापूर्वक समर्थन करते हैं। ऐसे लोगों के लिए कबीर का ऊपर कहा गया दोहा जैसे नैतिक आधार बन जाता है।
    ये हिंसा बालक के मन पर उसके मानसिक विकास पर क्या असर डालती है। हो सकता है तात्कालिक रूप से उसकी अंकतालिका में कुछ सुधार हो जाय या वह अधिक देर तक किताब लिए बैठा रहे ( पढ़े नहीं सिर्फ बैठा रहे), पर आखिरकार इसका प्रभाव विकृतकारी ही होता है। कुछ बालकों में पढ़ाई या किसी विषय का डर बैठ जाता है, वे स्वाभाविक जिज्ञासा भाव के बजाय भय के कारण पढ़ते हैं जो उन्हें ज्यादा दूर तक नहीं ले जा सकता। बालक के मन में कुंठा या विद्रोह जन्म ले सकता है। उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व असंतुलित हो सकता है। समाज एक उठती हुई प्रतिभा से वंचित हो जाता है।
    स्कूलों में शारीरिक दण्ड पर कानूनन प्रतिबंध लगाया गया है। फिर भी गुरु की मार से सिष के अपंग हो जाने, मर तक जाने के वाकये अखबारों में पढ़ने को मिलते हैं। इस पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही। क्योंकि हमारे समाज का एक तबका इसे उचित या कहें आवश्यक मानता है। ऐसी ही स्थितयों के लिए गाँधी जी ने कहा था कि –
    मुझे हिंसा पर आपत्ति है, जब यह अच्छा करती हुई प्रतीत होती है तो वह अच्छाई अस्थायी होती है, जबकि इसके द्वारा की गयी बुराई स्थायी।
    गाँधी जी हर तरह की हिंसा के विरोधी थे। लेकिन समाज में वैधता पा चुकी हिंसा को मिटाना सबसे दुष्कर है। क्योंकि इसे समाज हितकर मान लेता है। इसे अच्छाई लाने वाली एक आवश्यक बुराई मानकर नजरंदाज कर दिया जाता है।
    पिछले दिनों उत्तर प्रदेश पुलिस के एक दरोगा द्वारा एक बूढ़े टाइपिस्ट से मारपीट का वीडियो खूब फैला। चौतरफा रोष और प्रतिक्रिया को देखते हुए दरोगा को निलंबित कर दिया गया और पीड़ित को नया टाइपराइटर देकर बात खत्म कर दी गयी।
    पर सवाल है कि जिस घटना ने समाज में इतना रोष पैदा किया, उसकी जड़ें कहाँ थीं।

    यदि पिटने वाला एक निरीह वृद्ध के बजाय लड़की छेड़ने वाला मनचला होता तो। क्या तब भी दरोगा की हिंसा पर समाज में ऐसी ही प्रतिक्रिया होती। नहीं। क्योंकि उस हिंसा को हमारा समाज उचित मानता शायद प्रशंसनीय भी। सिनेमा हाल में भी खाकी वर्दी पहने नायक को सबसे सबसे ज्यदा तालियाँ तभी मिलती जब वह सामने वाले को पटक पटक कर पीट रहा होता है। यह है इस ‘अच्छी’ हिंसा की सामाजिक स्वीकृति। और यह स्वीकृति ही कारण है कि न्यायपालिका और कानून द्वारा लाख कोशिशों के बाद भी हिरासत में उत्पीड़न (custodial torture) रुकने का नाम नहीं ले रहा।
    लेकिन क्या इससे अपराध कम होते हैं। शायद कुछ कम होते हों। लेकिन वो तो इस हिंसा के बिने भी कम किए जा सकते हैं। अपराधी को दी गयी यह थर्ड डिग्री ही उन्हें कई बार पक्का कर हार्डकोर क्रिमिनल बना देती है जिससे नुकसान अंतत समाज को ही होता है। और यह नुकसान स्थायी होता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति के भविष्य में सुधरने की संभावना लगभग नहीं रहती।
    हिंसा का एक दूसरा आयाम मानसिक हिंसा है। । शारीरिक हिंसा प्रत्यक्ष होती है। हिंसा करने और सहने वाला दोनों को इसका ज्ञान रहता है। पर मानसिक हिंसा को पहचानना ही कठिन है इसीलिए रोकना भी। इसी कारण यह शारीरिक हिंसा से भी अधिक घातक हो सकती है और इसके परिणाम बेहद नकारात्मक।
    एक कर्मचारी से मानसिक उत्पीड़न का व्यवहार करके उसका बॉस तात्कालिक परिणाम भले ही अच्छे पा ले पर दीर्घकाल में उसका ये व्यवहार कर्मचारी की क्षमता पर नकारात्मक परिणाम डालेगा ही। लाभ क्षणिक होगा पर हानि स्थायी।
    हिंसा किसी भी रूप में हो, यह उसे झेलने वाले के मन में बदले की भावना भर देती है। मौका पाकर वह भी प्रतिहिंसा करता है और इससे फिर कभी खत्म न होने वाला संघर्ष का एक चक्र प्रारंभ हो जाता है। संपत्ति, जन, और संबंधों का नाश होता है।
    यही कारण था कि लंबे समय तक गोरों के हाथों दमन सहने के बाद भी जब नेल्सन मण्डेला को अधिकार मिला तो उन्होने सदाशयता से काम लिया। गोरों को क्षमा कर दिया। यदि वे बदले की कार्यवाही करते तो दक्षिण अफ्रीका की काली जनता को अच्छी ही लगती। पर मण्डेला को आभास था कि ऐसी हिंसा भले ही कितनी ही उचित जान पड़े, कभी भी राष्ट्र का स्थायी भला नहीं करेगी। उसे अशांति, घृणा और अव्यवस्था के गर्त में धकेल देगी।

    लेकिन प्रश्न है- क्या हिंसा द्वारा कभी भी स्थायी अच्छाई नहीं प्राप्त की जा सकती। आदर्श गाँधीवादी इसे साध्य और साधन की पवित्रता का पुराना प्रश्न मानकर सीधा जवाब दे देंगे – नहीं। तो फिर हम फिदेल कास्त्रो और उनके राष्ट्र क्यूबा के बारे में क्या कहें। कास्त्रो ने हिंसक क्रांति की थी, तो क्या उसके परिणाम स्थायी नहीं हुए। क्रांति के लिए बंदूक की नाल अनिवार्य मानने वाले माओ का चीन क्या विफल कहा जा सकता है।

    तर्क दिया जा सकता है कि इन क्रांतियों से बहुत से निर्दोष लोगों को कष्ट झेलने पड़े। एक अनुमान के अनुसार चीन में अब तक छह करोड़ लोगों की हत्या राजनीतिक कारणों से की जा चुकी है। सास्कृतिक क्रांति के नाम पर चीन में बहुत अधिक ज्यादातियाँ हुईं थीं। क्यूबा के अमेरिका समेत पश्चिमी देशों से संबंध अभी तक सामान्य नहीं हो पाये हैं। चीन में झिनझियांग और तिब्बत का विरोध अभी तक थमा नहीं है। पर यह भी सत्य है कि माओ का चीन आज विश्व शक्ति है और अमेरिका को चुनौती देने लगा है। कभी- कभी भारत को धमकाता भी है।

    यदि कल को चीन की लाल सेना अरुणाचल प्रदेश पर धावा बोल दे तो हम क्या करेंगे। अपने राष्ट्रपिता के आदर्शों का सम्मान करते हुए भी सशस्त्र प्रतिरोध ही हमारे पास एकमात्र विकल्प होगा, भले ही इस हिंसक संघर्ष के परिणाम अस्थायी हों या स्थायी।
  • आपके शायद हिंदी साहित्य लगती है तभी शुरू में आप कबीर के दोहे की व्याख्या में कुछ ज्यादा ही रम गए ,,,ऐसा लग रहा था आप निबंध नहीं हिंदी साहित्य 2 का उत्तर लिख रहे हो , लेखन शैली शानदार है शब्द रचना शानदार है पर निबंध साहित्यिक हो गया शुरू में
    ..फ्लो नहीं बन प् रहा था
    ..ज्यादा बिंदु नहीं कवर कर पाए
    ...अंत में माओ चीन क्यूबा के उदाहरण लिए पर लगता है आप conclude नहीं कर पाए
    ***
    समाज में वैधता पा चुकी हिंसा वाला पॉइंट शानदार था
    शब्द , लेखन शैली शानदार , गहराई है पर आयाम कम लगे
    ...
    keep it up, dont take it personally i wrote what i think
    ...
    :P
    मैं खड़ा हूँ उसी दोराहे पे, आज भी इंतज़ार में तेरे !
    या तो ज़िन्दगी आये तेरे लिबास में! या मैं चलूँ फिरदौस की तलाश में !!
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