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  • Why do Vaisheshikas consider ABHAVA as an independent category and what are the reason they give?
  • Why do Vaisheshikas consider ABHAVA as an independent category and what are the reason they give?

    अभाव: जिस पदार्थ का ज्ञान उसके प्रतियोगी के ज्ञान के बिना ना हो सके, उसे अभाव कहते हैं | जिस वस्तु का अभाव होता है उसे अभाव का प्रतियोगी और जिस स्थान या वस्तु में अभाव होता है उसे अभाव का अनुयोगी कहते हैं |

    वैशेषिक दर्शन में अभाव को भी एक पदार्थ माना गया है | अभाव का अर्थ है, किसी वस्तु का किसी स्थान विशेष और समय विशेष में ना होना | वैशेषिक के अनुसार अभाव को प्रमाण मानने का आधार यही है कि अन्य पदार्थों की भांति
    हमें अभाव का ज्ञान होता है अतः अभाव की भी सता है किंतु यह भावात्मक पदार्थों से भिन्न भावात्मक पदार्थ होता है |
    अभाव के भेद: संसर्गभाव-संबंध का अभाव Negation of relation, अन्योन्य अभाव:=अन्य का अन्य में अभाव
    Negation of being/mutual non-existence= तादात्म्य का अभाव
    प्राचीन नया ईको नै सामयिक अभाव Temporal non existence का विवरण किया है| जैसे ‘ इस कमरे में राम नहीं है’
    कणाद ने अभाव को पदार्थ नहीं माना वैशेषिक सूत्र 9 वें अध्याय में अभाव की व्याख्या मिलती है | पदार्थ के रुप में अभाव की गणना शिवदित्य मिश्र की सप्तपदार्थी से प्रारंभ हुई है |
    अभाव को पदार्थ मानने के निम्न कारण हैं--
    1)
    यदि प्राग भाव ना हो तो सभी वस्तुएं अनादी हो जाएंगी| प्राग भाव= मिट्टी में घड़े का अभाव= कार्य की उत्पत्ति से पूर्व
    यदि प्रध वंशा भाव ना हो तो सभी वस्तुएं नित्य हो जाएंगे| ध्वंस आभाव= घरे के टुकड़ों में घड़े का अभाव= ध्वंश के बाद
    यदि अत्यंत आभाव ना हो तो सभी वस्तुएं सदा और सर्वत्र विद्यमान रहेंगे| अत्यंत आभाव= नित्य अभाव= वायु में रूप का अभाव |
    यदि अन्योन्य भाव ना हो तो सब वस्तुएं अभिन्न हो जाएंगी
    2) विश्व की तार्किक व्याख्या के लिए निषेध का विचार आवश्यक है
    3) संबंध की व्याख्या के लिए: दो वस्तुओं के बीच संबंध का विकास होता है उसके पूर्व दो वस्तुओं के बीच संबंध का अभाव रहता है
    4) मोक्ष की व्याख्या के लिए: दुखों का अभाव
    5)अभाव को शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं जैसे टेबल पर किताब का अभाव
    ६) दिन में सूर्य का होना जितना वास्तविक है, उतना ही वास्तविक रात में सूर्य का अभाव भी है| इससे सिद्ध होता है कि अभाव वास्तविक होने के कारण सत्ता के रूप में स्वीकार किया जाता है|
    7) परिवर्तनशील एवं अनित्य वस्तुओं की व्याख्या अभाव के अभाव में नहीं हो सकती
    अभाव पदार्थ का निषेध
    प्रभाकर मीमांसा और अद्वैत वेदांत अभाव को अधिकरण मात्र locus मानते हैं| भूमि पर घड़ी के अभाव का मतलब इसके अलावा और कुछ नहीं की भूमि मात्र है | वेदांत तथा प्रभाकर के अनुयाई इसे पदार्थ नहीं मानते| वह इसे एक सरल अधिष्ठान मानते हैं |इसके निम्न कारण है---
    आन वस्था दोष का पाया जाना= अगर अभाव को सत्य माना जाए तो अभाव के अभाव को और फिर अभाव के अभाव को तथा इस तरह अनंत अभावों की सत्ता माननी पड़ेगी
    इस अनवस्था से बचने के लिए प्राचीन न्याय ने यह माना कि अभाव का अभाव भाव है| नव्य न्याय मैं यह माना कि अभाव तो भाव नहीं हो सकता| लेकिन पहले अभाव के अभाव का अभाव पहले अभाव के बराबर है| अर्थात प्रथम निषेध के निषेध का निषेध प्रथम निषेध के समान है|
    अभाव का ज्ञान कैसे
    न्याय = पात्र के विशेषण के रूप में जलाभाव प्रत्यक्ष का विषय है | भूमि के प्रत्यक्ष से उस पर घट के अभाव की विशेषता का भी प्रत्यक्ष हो जाता है|
    कुमारी भट्ट= अनुपलब्धि प्रमाण से
    बौद्ध= अभाव की समस्या वस्तुतः तत्व मीमांसाईय ना होकर ज्ञान मीमांसीय है| अभाव मानसिक सरचना मात्र है कल्पना मात्र है जिसका ज्ञान अनुमान से हो जाता है





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